सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – इतिहास के आइने में(somnath jyotirling history)

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – इतिहास के आइने में(Somnath Jyotirling History)

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  • सोमनाथ मंदिर (Somnath Mandir) को वेरावल, सोमनाथपाटण, प्रभास और प्रभासपाटण आदि कई नामों से जाना जाता है। इस मंदिर की भूमि के नीचे सोमनाथ लिंग की स्थापना की गई है। भू-गर्भ में होने से मंदिर के इस हिस्से में रोशनी कम रहती है। इस मंदिर में पार्वती, सरस्वती देवी, लक्ष्मी, गंगा और नंदी की भी मूर्तियां स्थापित हैं। भूमि के ऊपरी भाग में शिवलिंग से ऊपर अहल्येश्वर मूर्ति है। मंदिर परिसर में गणेशजी का मंदिर है जबकि उत्तर द्वार के बाहर अघोर लिंग की मूर्ति स्थापित है। प्रभावनगर में अहल्याबाई मंदिर के पास मां महाकाली का मंदिर है। इसी तरह गणेशजी, भद्रकाली और भगवान विष्णु का मंदिर है। नगर द्वार के पास गौरीकुंड सरोवर है। इसके पास ही एक प्राचीन शिवलिंग है। प्रभासपाटण के बाहर एक ‘समुद्रका’ नामक कुंड है। श्रद्धालु सबसे पहले यहां स्नान करते हैं। इसके बाद वे प्राची त्रिवेणी में स्नान करने के लिए जाते हैं। नगर द्वार से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर प्राची त्रिवेणी है। उससे पहले रास्ते में ब्रह्माकुंड बावड़ी है। उसी जगह ब्रह्माकंडलु नामक तीर्थ और ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर भी है। आगे चलने पर ‘आदिप्रभास’ और ‘जलप्रभास’ नामक दो कुंड बने हैं। हिरण्या, सरस्वती और कपिला नामक तीन नदियां इस स्थान से पूर्व दिशा में समुद्र में मिलती है। इन तीनों नदियों का संगम होने से ही इसे ‘प्राची त्रिवेणी’ कहा जाता है।

    गजनबी से लेकर अहमदशाह तक सभी ने लूटा – History Somnath Jyotirling Hindi




    अफगान लुटेरा महमूद गजनबी 1024 में भारत आया और सोमनाथ मंदिर की अकूत संपत्ति को देखकर हतप्रभ रह गया। उसने इस मंदिर में मौजूद धन-संपदा को पूरी लूट-खसोट लिया। सारा धन, हीरे, जवाहरात आदि लेकर अफगानिस्तान ले गया। जब-जब वह दोबारा सोमनाथ आया, धन के भंडार फिर वैसे ही भरे मिले। वह हर बार मंदिर को लूटता। कहते हैं कि आखिर में परेशान होकर उसने इस मंदिर को तहस-नहस कर दिया ताकि यहां पर फिर ऐसी संपदा एकत्र न हो सके। हालांकि, महमूद गजनबी मूर्ति भंजक होने के कारण काफी प्रयास के बावजूद सोमनाथ शिवलिंग को नहीं तोड़ पाया। इस पर उसने लिंग के चारों तरफ भीषण आग लगाने को कहा। सोमनाथ मंदिर में नीलमणि और हीरे-मोती जड़े छप्पन खंभे लगे थे। सोमनाथ मंदिर का भग्नावशेष आज भी समुद्र किनारे मौजूद है। महमूद गजनबी के हमलों के बाद राजा भीमदेव ने मंदिर की प्रतिष्ठा की। सिद्धराज जयसिंह, विजयेश्वर कुमार पाल ने जैनाचार्य हेमचन्द्र सरि के साथ और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार कराया था। हालांकि, इस मंदिर को मुसलमान लुटेरों और शासकों ने बहुत लूटा और मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट किया। अलाऊद्दीन खिलजी ने 1297 ईस्वी में फिर से सोमनाथ मंदिर का ध्वंस किया। 1395 ई. में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने भी मंदिर का विध्वंस किया। फिर अहमदशाह ने 1413 ई. में सोमनाथ मंदिर को तोड़ डाला।




    कैसे पहुंचे

    सोमनाथ मंदिर (Somnath Mandir) को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है। गुजरात (सौराष्ट्र) के काठियावाड़ क्षेत्र के प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्णचंद्र ने यदु वंश का संहार करने के बाद अपनी नर लीला समाप्त कर ली थी। सोमनाथ मंदिर पहुंचने के लिए सौराष्ट्र के पश्चिमी रेलवे स्टेशन की राजकोट-वेरीवल और खिजडिया वेरावल लाइनें हैं। इन दोनों रेलवे स्टेशन से वेरावल पहुंचा जा सकता है। वेरावल रेलवे स्टेशन से प्रभासपाटण 5 किलोमीटर की दूर है। यहां से बस, टैक्सी से प्रभासपाटण पहुंचा जा सकता है।

    सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की धार्मिक मान्यता – Religious Somnath Jyotirling

    सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से क्षय और कोढ़ नष्ट हो जाते हैं। यशस्वी चंद्रमा के कारण सोमेश्वर शिव इस भूतल को पवित्र कर प्रभास क्षेत्र में विराजते हैं।

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