चंबा की मणिमहेश तीर्थ यात्रा(chamba manimahesh yatra)

चंबा की मणिमहेश तीर्थ यात्रा(Chamba Manimahesh Yatra)

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  • पर्वतों के राजा कहलाने वाला हिमालय भारत वर्ष के उत्तर में करीब 2500 किलोमीटर लंबी यह पुरातन पर्वत श्रृंखला एक पहरेदार की तरह भारत की रक्षा करती प्रतीत होती है। हिमालय का महत्व हिंदू धर्म ग्रंथों में इसका विशेष उल्लेख मिलता है। इसी महान हिमालय की धौलाधार, पांगी और जांस्कर श्रृंखलाओं से घिरा कैलाश पर्वत मणिमहेश-कैलाश के नाम से प्रसिद्ध है। सदियों-सदियों से भक्तगण इस मनोहारी शैव तीर्थ की यात्रा करने के लिए हाड गला देने वाली ठंड और बर्फ का सफर कर यहां पहुंचते हें। हिमाचल के चंबा जिला से होते हुए कैलाश पहुंचने पर मणिमहेश (Mani Mahesh) नाम का एक छोटा सा पवित्र सरोवर मिलता है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई करीब 13,500 फुट है। इस सरोवर के पूर्व की ओर वह महान पर्वत है जिसे कैलाश कहा जाता है। आसमान को छूने वाले इसके बर्फ से ढके शिखर की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 18,564 फुट है।

    मणिमहेश-कैलाश की भौगोलिक स्थिति




    शैव तीर्थ स्थल मणिमहेश-कैलाश हिमाचल प्रदेश में चंबा जिले के भरमौर में स्थित है। मान्यता के अनुसार, 550 ईस्वी में भरमौर मरु वंश के राजा मरुवर्मा की राजधानी था। भरमौर में उस समय के बने मंदिर समूह आज भी अपनी गरिमामयी आभा लिए उसी तरह अटल खड़े हैं। मणिमहेश- कैलाश के लिए भी बुद्धिल घाटी जो भरमौर का भाग है, से होकर जाना पड़ता है।

    कब से शुरू हुई मणिमहेश यात्रा

    इस यात्रा का प्रमाण सृष्टि के आदि काल से ही मिलता है। इसके बाद भरमौर नरेश मरुवर्मा के 550 ईस्वी में भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए मणिमहेश कैलाश आने-जाने का उल्लेख है। हालांकि, 920 ईस्वी में भरमौर के मरु वंश के वंशज राजा साहिल वर्मा ने संतान प्राप्ति के लिए चौरासी योगियों 10 पुत्र और चंपावती नाम की एक कन्या प्राप्त हुई। इसके बाद साहिल वर्मा ने भरमौर में 84 मंदिरों के एक समूह का निर्माण कराया। इनमें मणिमहेश (Mani Mahesh) नाम से शिव मंदिर और लक्षणा देवी नाम से एक देवी मंदिर विशेष महत्व रखते हैं। राजा साहिल वर्मा ने ही अपनी बेटी के नाम पर चंबा शहर बसाया और राजधानी भी चंबा में स्थानांतरित कर दी। उसी समय चरपटनाथ नाम के एक योगी हुए।




    मान्यता है कि योगी चरपटनाथ के परामर्श पर साहिल वर्मा ने राज्य के विस्तार के लिए मणिमहेश-कैलाश की वार्षिक यात्रा आरंभ की। तभी से लगभग दो सप्ताह के बीच होने वाली यह यात्रा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) से श्रीराधाष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) तक होती है। इस यात्रा के अलावा भी यहां जाया जा सकता है लेकिन करीब 15 किमी की खड़ी चढ़ाई आस्था की भरपूर परीक्षा लेती है।

    हडसर से कठिन पैदल यात्रा

    हडसर या हरसर नामक स्थान सडक़ मार्ग का अंतिम पड़ाव है। यहां से आगे पहाड़ी रास्तों पर पैदल या घोड़े-खच्चरों की सवारी कर ही सफर तय होता है। चंबा, भरमौर और हडसर तक सडक़े बनने से पहले चंबा से ही पैदल यात्रा शुरू हो जाती थी। हडसर से मणिमहेश-कैलाश 15 किलोमीटर दूर है। इस बीच सिर्फ धंछो नामक एक पड़ाव पर ही भोजन और रात के ठहरने की व्यवस्था है।

    गौरीकुंड

    मणिमहेश (Mani Mahesh) सरोवर से लगभग डेढ़ किलोमीटर पहले गौरीकुंड तीर्थ स्थल है। तिब्बत में कैलाश के साथ मानसरोवर, आदि कैलाश के साथ पार्वती कुंड और भरमौर में कैलाश के साथ मणिमहेश सरोवर। यहां पर भक्त बर्फ से ठंडे जल में स्नान कर श्वेत पत्थर की शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते हैं।

    होते हैं नीलमणि के दर्शन

    हिमाचल सरकार ने इस पर्वत को टरकोइज माउंटेन यानि वैदूर्यमणि या नीलमणि कहा है। मणिमहेश में कैलाश पर्वत के पीछे जब सूर्य उदय होता है तो सारे आकाश मंडल में नीलिमा छा जाती है और किरणें नीले रंग में निकलती हैं। मान्यता है कि कैलाश पर्वत में नीलमणि का गुण-धर्म हैं जिनसे टकराकर सूर्य की किरणें नीले रंग में रंगती हैं।




    कैसे पहुंचे

    हर साल मणिमहेश (ManiMahesh) यात्रा हडसर से शुरू होकर भरमौर से लगभग 17 किलोमीटर, चंबा से लगभग 82 किलोमीटर और पठानकोट से करीब 220 किलोमीटर की दूरी तय कर पूरी होती है। पठानकोट मणिमहेश-कैलाश यात्रा के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है, जबकि निकटतम हवाई अड्डा कांग

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