लाखों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक जगन्नाथ पुरी(jagannath puri temple history)

लाखों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक जगन्नाथ पुरी(Jagannath Puri temple history)

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  • भारत के करोड़ों हिंदुओं की आस्था का एक केंद्र भगवान जगन्नाथ की जगन्नाथ पुरी मंदिर है। ओडिशा में 10वीं शताब्दी में बना यह प्राचीन मंदिर चार धामों में से एक धाम है। जीवन में एक बार हर हिंदू इस मंदिर में पहुंच कर भगवान जगन्नाथ की कृपा पाने की आस रखता है। यहां आने वाले लोगों खासकर हिंदुओं में जगन्नाथ्ज्ञ जी के प्रति अटूट आस्था देखने को मिलती है। जगन्नाथ जी के प्रति हिंदुओं की अटूट आस्था का कारण जानने के लिए यहां का इतिहास और इससे जुड़ी कथाएं जानना उपयोगी है।

    मंदिर के बारे में कथा – Jagannath Puri temple history – Jagannath Madir katha




    इतिहासकारों का कहना है कि मंदिर का निर्माण राजा इंद्रद्विमुना ने स्वप्न में भगवान के दर्शन देकर उनकी आज्ञा के अनुसार करवाया। राजा ने मंदिर का निर्माण तो करवा दिया लेकिन मंदिर के भीतर प्रतिमाएं रखने को लेकर वह निर्णय नहीं ले सका। ब्राह्मïणों के कई सुझाव उसने नामंजूर कर दिए। कई साल बीतने पर भी राजा प्रतिमाओं को अंतिम रूप नहीं दे पाया। कथा है कि एक दिन राजा को फिर सपना आया जिसमें ईश्वर ने उसे समुद्र किनार जाकर प्रतिमाओं के बारे में निर्णय का रास्ता मिलने की बात कही। समुद्र किनारे जाते समय राजा को एक सन्यासी मिला जिसने कहा कि आगे तुम्हें दो लोग मिलेंगे जो मूर्ति बनाने में तुम्हारी मदद करेंगे। राजा आगे गया तो उसे दो बढ़ई मिले। उन्होंने राजा की इच्छा जानने पर कहा कि राजा एक वृक्ष लाकर उन्हें दे तो वह मूर्ति बना देंगे।

    विश्व विख्यात जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा – Jagannath Puri Rath yatra

    हर साल ओडिशा के पूर्वी तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी (Jagannath Puri) मंदिर में भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का उत्सव पारंपरिक रीति और धूमधाम से मनाया जाता है। जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से शुरू कर शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है। इस रथ को हाथों से खिंचना बेहद शुभ माना जाता है। वहीं अब जगन्नाथ जी की रथ यात्रा उत्सव देश भर के कई अन्य शहरों में मनाया जाने लगा है।

    कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के लकड़ी के रथ

    इस रथ यात्रा में भगवान श्री कृष्ण यानि जगन्नाथ जी, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ बनाया जाता है। लकड़ी के बने इन रथों में जगन्नाथजी के रथ को गरुड़ध्वज या कपिलध्वज, बलराम जी के रथ को तलध्वज और बहन सुभद्रा के रथ को देवदलन या पद्मध्वज कहते हैं।




    रथयात्रा का पूरा ब्योरा – Jagannath Puri Rath yatra history

    रथ यात्रा के पहले दिन भगवान जगन्नाथ, बलराम और बहन सुभद्रा का रथ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की शाम तक जगन्नाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर बने गुंडीचा मंदिर तक खींच कर लाया जाता है। दूसरे दिन रथ में रखी जगन्नाथ जी, बलराम जी और सुभद्रा जी की मूर्तियों को इस मंदिर में लाया जाता है। अगले अगले सात दिन तक ये यहीं निवास करते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन वापसी की यात्रा शुरू होती है। इसे बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। इसके बाद दोबारा गुंडिचा मंदिर से भगवान का रथ खींचकर जगन्नाथ मंदिर लाते हैं। मंदिर लाने के बाद प्रतिमाओं को दोबारा विधि-विधान से गर्भ गृह में स्थापित किया जाता है।




    कब शुरू हुई पुरी की रथयात्रा

    पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार श्री सुभद्रा जी ने द्वारका नगर देखना चाहा, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें रथ पर बैठाकर नगर घुमाया। इस घटना की याद में हर साल तीनों देवों यानि श्री कृष्ण, श्री बलराम और श्री सुभद्रा जी को रथ पर बैठाकर नगर दर्शन कराए जाते हैं।

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