हीर रांझा के प्यार की अमर कहानी – heer ranjha love story
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हीर रांझा के प्यार की अमर कहानी – Heer Ranjha Love Story

प्यार को कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती या कहें कि इस अहसास को शब्दों में बंया नहीं किया जा सकता। यह ऐसा अहसास है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। यह दो लोगों को बिना कुछ कहें एक दूसरे के दिलों में अपनी एक अलग जगह बना देती है। इसीलिए कहा जाता है कि सच्चा प्यार (Real Love) बहुत मुश्किल से मिलता है। ऐसी ही एक अमर प्रेम कहानी है हीर रांझा के प्रेम की कहानी।




हीर रांझा के प्यार की अमर कहानी – Heer Ranjha Ke Pyar Ki Kahani Love Story

पाकिस्तान के एक गांव से है नाता

पाकिस्तान में चिनाब नदी के किनारे एक गांव जिसका नाम तख़्त हजारा था, में रांझा (Ranjha) जनजाति के लोगों की बहुतायत थी। इसी गांव का मुख्य जमींदार था जिसका नाम था मौजू चौधरी। उसके चार पुत्र थे और सभी पुत्रों में सबसे छोटा था रांझा। रांझा का असली नाम ढीदो था और उसका उपनाम रांझा था, इसलिए उसे सभी रांझा कहते थे। सभी भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण वह पिता का प्यारा था। उसके भाई खेती में मेहनत करते और प्रेमी स्वभाव का रांझा सारा दिन बांसुरी बजाता रहता। उसको बचपन से ही खूबसूरती से प्यार था। उसने अपने सपनों में ही एक खूबसूरत हसीना की तस्वीर बना ली थी। रांझा काफी आशिक मिजाज था। 12 साल की उम्र में उसके पिता की मृत्यु हो गई और वह भाइयों से अलग रहता। वह सारा दिन पेड़ों के नीचे बैठा रहता और अपने सपनों की हसीना के बारे में सोचता और बांसुरी बजाता रहता था।

रांझा ने घर छोड़ दिया

जमीन की लड़ाई के चलते रांझा ने घर छोड़ दिया। रांझा वह रात एक मस्जिद में रहा और समय व्यतीत करने के लिए सोने से पहले बांसुरी बजाने लगा। मस्जिद के मौलवी ने बांसुरी बजाने से मना किया और कहा कि बांसुरी का संगीत इस्लामिक नहीं है और ऐसा संगीत मस्जिद में बजाना वर्जित है । अगली ही सुबह वह मस्जिद से निकल गया।




सियाल जाकर हीर (Heer) के पिता मवेशी चराने लगा

इसके बाद रांझा दूसरे गांव जा पहुंचा जो गांव हीर का था। हीर का जन्म सियाल जनजाति के संपन्न जाट परिवार में हुआ था जो पाकिस्तान में ही है। रांझा ने हीर के पिता के यहाँ मवेशी चराने का काम शुरू कर दिया। हीर को रांझा (Ranjha) की बांसुरी की आवाज बहुत पंसद आई और वह धीरे-धीरे रांझा से प्यार करने लगी। वो बहुत सालों तक छुप-छुप कर मिलते रहे। एक दिन हीर के चाचा ने उन्हें साथ देख लिया और जा कर सारी बात हीर के पिता और माता को बता दी। हीर के पिता ने रांझा को नौकरी से निकाल दिया और दोनों को न मिलने को कह दिया।

हीर के निकाह के बाद बन गया जोगी

सैदा खेरा नाम के व्यक्ति से हीर का निकाह हो गया। परिवार के दबाव में आकर हीर ने निकाह कर तो लिया पर वह रांझा को कभी भूल नहीं पाई। कहानी कहती है कि जब हीर के निकाह कि बात रांझा को पता चली तो उसका दिल टूट गया। रांझा दीवानों कि तरह गाँव-गांव भटकने लगा। एक बार जब वह गाँव-गाँव भटक रहा था तो उसकी मुलाकात एक जोगी से हुई। उस जोगी का नाम गोरखनाथ था। वह जोगी संप्रदाय के कानफटा समुदाय से था और उसके सानिध्य में आकर रांझा भी जोगी बन गया। उसने समुदाय की प्रथाओं का पालन कर अपने कान छिदवा लिए और भौतिक संसार त्याग कर जोगी बन गया।

हीर से दुबारा मुलाकात

रांझा फकीर बनकर गाँव-गाँव घूमने लगा। जब वह हीर के गाँव में पहुँचा तो उसकी बांसुरी की आवाज सुनकर हीर (Heer) बाहर आई और उसे भिक्षा देने लगी। दोनों एक-दूसरे को देखते ही पहचान गए। रांझा रोजाना आता और हीर उसे हर रोज भिक्षा देती। दोनों रोज मिलने लगे। यह सब हीर की भाभी ने देख लिया और उसने उसे मनाकर दिया। रांझा गांव छोड़ कर कहीं और चला गया।

दुबारा जुदाई

रांझा से जुदाई में हीर बीमार हो गई। जब वैद्य-हकीमों से उसका इलाज नहीं हो पाया तो हीर के ससुर ने रांझे से मदद मांगी। रांझा हीर के घर आया और उसने हीर के माथे पर अपना हाथ रखा और हीर को होश आने लगा। हीर ने धीरे-धीरे आंखें खोल दी। वह ठीक हो गई लेकिन जब गांव वालों को पता चला कि फकीर कोई ओर नहीं रांझा है तो उन्होंने उसे पीट -पीटकर गांव से बाहर निकाल कर दिया।

चोर समझकर पकड़ लिया

वहां के राजा ने रांझा को चोर समझकर पकड़ लिया और जब रांझा ने अपने ऊपर बीती सारी बात राजा को बताई तो राजा ने हीर के पिता को आदेश दिया कि वह हीर की शादी रांझा से कर दे। राजा के आदेश के डर से उसके पिता ने हां तो कह दी पर घर आकर हीर को जहर दे दिया। जब वह वापिस आया तो उसे हीर के मरने की खबर मिली और खबर सुनते ही रांझा ने भी दम तोड़ दिया। हीर और रांझा मर गए लेकिन उनकी मोहब्बत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

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