संत रविदास का जीवन परिचय – biography of raidas
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संत रविदास का जीवन परिचय – Biography of Raidas

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  • रैदास (Raidas – Ravidas) का समय सन् 1398 से 1518 ई. के आसपास का है। संत रैदास काशी के रहने वाले थे। इन्हें रामानंद का शिष्य माना जाता है। नाभादास में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रि उच्चता का प्रतिपादन मिलता है। प्रियादास कृत भक्तमाल की टीका के अनुसार चित्तौड़ की झालारानी उनकी शिष्या थीं जो महाराणा सांगा की पत्नी थीं। इस दृष्टि से रैदास का समय विक्रम की सोलहवीं शती के अंत तक चला जाता है। कुछ लोगों के अनुमान चित्तौड़ की रानी मीराबाई ही थीं और उन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था। मीरा ने अपने अनेक पदों में रैदास को गुरु रूप में स्मरण किया है।

    रविदास का जीवन परिचय, जीवनी – Guru Raidas ki jeevani – Biography of Ravidas in hindi




    काशी में हुआ गुरु रैदास (Raidas – Ravidas) का जन्म

    काशी में जन्मे रविदास का समय 1482-1527 ई. के बीच का मानते हैं। रैदास (रविदास) का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम रघु और माता का नाम घुरविनिया था। रैदास ने साधु-संतों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वह अपना काम पूरी लगन और परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।

    रामानंद के शिष्य रैदास (रविदास) का व्यक्तित्व

    रैदास (Raidas – Ravidas) के समय में स्वामी रामानंद काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित संत थे। रैदास उनकी शिष्य-मंडली के सदस्य थे। रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-संतों की सहायता करने में उनको सुख का अनुभव होता था। वह बिना पैसे लिए जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास और उनकी पत्नी को घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही एक अलग झोपड़ी में रहने लगे और अपने व्यवसाय का काम करते थे। वहीं शेष समय ईश्वर-भजन और साधु-संतों के सत्संग में व्यतीत करते थे।

    प्रेम की शिक्षा और संदेश – Education & Message of Love

    रविदास (Raidas – Ravidas) ने ऊँच-नीच की भावना और ईश्वर-भक्ति के नाम पर किए जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है। उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित – भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना आवश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया।

    सत्संग के प्रति बचपन से ही अभिरूचि

    शैशवावस्था से ही सत्संग के प्रति उनमें तीव्र अभिरुचि थी। रामजान की की मूर्ति बनाकर पूजा करते थे। ये परम संतोषी और उदार व्यक्ति थे। वे बनाए हुए जूते बहुधा साधु-सन्तो में बांट दिया करते थे। एक बार किसी महात्मा ने उन्हे पारस पत्थर दिया जिसका उपयोग भी उसने बता दिया। कुछ दिनों के बाद जब वह साधु वापिस आए तो उन्होंने पारस पत्थर के बारे में पूछा तो संत रैदास ने कहा कि जहां रखा है, वहीं से उठा लो और सचमुच वह पारस पत्थर वहीं पड़ा मिला।




    दलित, उपेक्षित रैदास (Raidas – Ravidas) ने किया स्वानुभूति और चेतना का संचार

    संत रविदास (Sant Ravidas) मध्ययुगीन काल में हुए थे। ब्राह्मणों की पैशाविक मनोवृत्ति से दलित और उपेक्षित पशुवत जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य थे। यह सब उनकी मानसिकता को उद्वेलित करता था। संत रैदास की समन्वयवादी चेतना इसी का परिणाम है। उनकी स्वानुभूतिमयी चेतना ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिंतन ने शोषित और उपेक्षित शूद्रों में आत्मविश्वास का संचार किया। संत रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। संत रैदास के मन में इस्लाम के लिए भी आस्था का समान भाव था। कबीर की वाणी में जहां आक्रोश की अभिव्यक्ति है, वहीं संत रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनों धर्मो को समान भाव से मानवता के मंच पर लाती है। संत रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे।

    वर्णाश्रम को समूल नष्ट कर मानव धर्म की स्थापना

    वर्णाश्रम धर्म को समूल नष्ट करने का संकल्प, कुल और जाति की श्रेष्ठता की मिथ्या सिद्धि संत रैदास की आसेर से अपनाए गये समन्वयवादी मानवधर्म का ही एक अंग है। इसे उन्होंने मानवतावादी समाज के रूप में संकल्पित किया था। उन्होंने कहा, जन्मजात मत पूछिये, का जात अरू पात। रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहि जात कुजात॥

    प्रेम भक्ति अष्टांग मार्ग में शामिल

    उपनिषदों से लेकर महर्षि नारद और शांडिल्य ने भक्ति तत्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। रैदास ने भक्ति में रागात्मिका वृत्ति को ही महत्व दिया है। नाम मार्ग और प्रेम भक्ति उनकी अष्टांग साधना में ही है। रैदास की अष्टांग साधना पध्दति उनकी स्वतंत्र और स्वछंद चेतना का प्रवाह है। यह साधना पूर्णत: मौलिक है।

    रैदास की प्रकाशित रचनाएं – Raidas Poetry

    रैदास (Raidas – Ravidas) अनपढ़ कहे जाते हैं। संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएं संकलित मिलती हैं। राजस्थान में हस्तलिखित ग्रंथों में रूप में भी उनकी रचनाएं मिलती हैं। रैदास की रचनाओं का एक संग्रह बेलवेडियर प्रेस प्रयाग से प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा इनके बहुत से पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित मिलते हैं। रैदास के पदों पर अरबी-फ़ारसी के प्रभाव का अधिक संभाव्य कारण उनका लोक प्रचलित होना ही प्रतीत होता है।




    समाज कल्याण में रैदास (संत रविदास) का महत्व

    रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रैदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। संत रैदास ने एक पंथ भी चलाया, जो रैदासी पंथ के नाम से प्रसिद्ध है। इस मत के अनुयायी पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि में पाये जाते हैं।

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