ऑटिज्म के कारण, लक्षण और रोकथाम – autism symptoms, cause and treatment

ऑटिज्म के कारण, लक्षण और रोकथाम – Autism Symptoms, Cause and Treatment

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  • बच्चों के विकास में होने वाले कई विकास संबंधी विकारों में ऑटिज्म (आत्मकेंद्रित) सबसे ज्यादा पाया जाने वाला आम मस्तिष्क विकार है। एक आकलन के अनुसार भारत में लगभग २० लाख ऑटिज्म से पीडि़त बच्चे हैं। ऑटिज्म (Autism) एक मस्तिष्क संबंधी विकार है जो मस्तिष्क की सामान्य गति या विकास को बाधित करता है। यह विकार एक बच्चे के बातचीत संबंधी कौशल और लोगों के साथ संपर्क स्थापति करने की उनकी क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालता है। ऑटिज्म का उपचार पैदा होने के 18 महीनों तक नहीं किया जा सकता है। ऑटिज्म का इलाज शुरू करने का आदर्श समय एक से दो वर्ष तक बताया जाता है। वैज्ञानिक शोध इस बात की तसदीक करते हैं कि नवजात के शुरू के 36 महीनों यानी तीन साल में मस्तिष्क का लगभग 80 प्रतिशत विकसित हो जाता है। इलाज में दिक्कत यह है कि माता-पिता जानकारी के अभाव में ऑटिज्म का इलाज देर से शुरू करते हैं। सही समय पर उपचार शुरू करने से शिशुओं और बच्चों में मानसिक विकलांगता को रोका जा सकता है। ऑटिज्म सोसायटी ऑफ अमेरिका ने ऑटिज्म को जटिल विकास विकलांगता के रूप में परिभाषित किया है।




    ऑटिज्म – स्वलीनता के उपचार – Autism Ka Upchar – Symptoms and Causes

    सामाजिक बहिष्कार से बढ़ता है मर्ज

    यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऑटिज्म से पीडि़त कोई भी दो बच्चे समान नहीं होंगे। ऑटिज्म से पीडि़त हर बच्चा एक अलग स्पेक्ट्रम पर है। सबसे बड़ी दिक्कत ऑटिज्म के साथ यह है कि इससे जुड़ा सामाजिक बहिष्कार या कहें कलंक बच्चों और व्यस्कों के लिए मुश्किल कर देता है। ऑटिज्म (Autism) से पीडि़त लोगों के लिए सामाजिक मानसिकता अकसर असंवेदनशील हैं। माता-पिता ऑटिज्म से पीडि़त अपने बच्चों को दूसरे सामान्य बच्चों के साथ मिलने नहीं देते। इस कारण वे सामाजिक बहिष्कार का शिकार बन जाते हैं। विशषज्ञों की मानें तो माता-पिता को यह समझना होगा कि ऑटिज्म से पीडि़त कोई भी बच्चे एक जैसे नहीं हैं। ऐसे में दोनों के सुधार और प्रगति भी अलग-अलग होगी।

    स्वलीनता के सामान्य लक्षण – Autism Ke Lakshan

    ऑटिज्म से पीडि़त बच्चे या व्यस्क सामाजिक संपर्क और संचार या बातचीत करने में बहुत सहज नहीं दिखते। इन्हें सामाजिक संपर्क स्थापित करने, संचार (मौखिक और गैर मौखिक) करने में दिक्कत रहती है। वहीं सोच और व्यवहार कौशल में भी ये सहज प्रतीत नहीं होते। संपर्क करने के दौरान आंख से संपर्क बनाए रखना या मुस्कुराहट बनाए रखने में दिक्कत महसूस करते हैं, या कहें कि ये बातचीत के दौरान आई कांटैक्ट या मुस्कुराहट नहीं रख पाते। कई बार या कहें अकसर, जब इन्हें बुलाया जाता है तो ये असंगत प्रतिक्रिया देते हैं। इसी तरह शोर के लिए ये अतिसंवेदनशील होते हैं। ये अकसर अपने विचारों में खोए देखे जाते हैं। कई मामलों में ये खुद को मारने या खुद को काटने जैसी हरकते भी करते हैं। संप्रेषण करते समय इशारों का उपयोग नहीं करना, दोस्त बनाने में असमर्थता और शरीर के अंगों को बार-बार हिलाना या अपने कहे वाक्यों को दोहराना ऐसे कई लक्षण हैं जिनसे ऑटिज्म की पहचान की जा सकती है।
    इसे तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:



    एस्पर्जर सिंड्रोम (एएस)

    यह ऑटिज्म का सबसे हल्का रूप है जिसमें पीडि़त लोगों को किसी विशेष वस्तु या विषय में रुचि होना आम तौर पर देखा जाता है। ऑटिज्म के विकार से पीडि़तों में उसी विषय के बारे में अंतहीन सीखने, पढऩे और चर्चा करने में रुचि देखी जाती है। ऐसे बच्चे उच्च-कार्यकारी आत्मकेंद्रित या ऑटिस्टिक कहे जाते हैं।

    व्यापक विकास संबंधी विकार (पीडीडी-एनओएस)

    यह एएस से ज्यादा गंभीर ऑटिज्म का रूप है लेकिन ऑटिस्टिक डिसऑर्डर से कम गंभीर है। पीडीडी-एनओएस से पीडि़त लोगों के लक्षण व्यापक रूप से भिन्न होते हैं। इस बीमारी से पीडि़त कोई भी दो लोग समान लक्षण प्रदर्शित नहीं करेंगे लेकिन गरीब सामाजिक संपर्क और एस्पर्जर सिंड्रोम की तुलना में खराब भाषा कौशल लेकिन बेहतर ऑटिस्टिक डिसऑडर की तुलना में बेहतर इसके कुछ सामान्य लक्षणों में हैं।

    ऑटिस्टिक डिसऑर्डर – सबसे गंभीर

    एस्पर्जर्स सिंड्रोम और ऑटिस्टिक डिसऑर्डर की तुलना में कम पुनरावृत्तीय व्यवहार देखने में पाया जाता है। ऑटिस्टिक डिसऑर्डर ऑटिज्म का सबसे गंभीर रूप है और इस समस्या से पीडि़त लोगों को गंभीर नुकसान हो सकता है। उनके पास सामाजिक संपर्क, बातचीत के साथ समस्याएं अकसर देखी जाती है। इसमें सबसे दोहरावदार व्यवहार देखे जाते हैं। ऑटिज्म के इस विकार से पीडि़तों के व्यवहार में मानसिक मंदता प्रदर्शित होती है।
    इसके अलावा ऑटिज्म का रिट सिंड्रोम बचपन के विघटनकारी विकार (सीडीडी) को प्रदर्शित करता है। इस विकार से पीडि़त लोग भाषा कौशल, बौद्धिक कौशल, दौरे और वे अपनी खोई क्षमताओं को ठीक नहीं करने जैसे लक्षण जाहिर करते हैं।

    ऑटिज्म (Swalinta- स्वलीनता ) से बचने के कुछ कारगर परहेज – Autism Ke Upchar

    ऑटिज्म (Swalinta) की रोकथाम के लिए अतिरिक्त एहतियात और देखभाल की जरूरत रहती है। इनमें डॉक्टर की नियमित जांच बहुत अहम है। ऑटिज़्म को रोकने के लिए गर्भावस्था के दौरान महिला का मेडिकल चेक अप और दवाएं लेना बहुत जरूरी है। यह मां के शरीर और इस तरह बच्चे के शरीर के सभी परिवर्तनों को जांचने में मददगार होगा। गर्भावस्था बच्चे के मस्तिष्क का विकास काफी हद तक तय हो जाता है।

    शराब और नशीली दवाओं के सेवन से बचें। गर्भावस्था के दौरान ड्रग्स और अल्कोहल का प्रयोग बच्चे को ऑटिज्म विकसित करने की संभावना बढ़ाता है।

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