चाणक्य के सर्वश्रेष्ठ सुविचार – best chanakya quotes

चाणक्य के सर्वश्रेष्ठ सुविचार – Best Chanakya Quotes

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  • आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) को भारतीय इतिहास के सर्वाधिक प्रखर कुटनीतिज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक में अपने राजनैतिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है। इनका महत्व आज भी स्वीकार्य है। कई विश्वविद्यालयों ने कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ को पाठ्यक्रम में निर्धारित किया गया है। महान मौर्य वंश की स्थापना का वास्तविक श्रेय चाणक्य को है। चाणक्य एक विद्वन, दूरदर्शी तथा दृढ़ संकल्पी व्यक्ति थे। साथ ही, अर्थशास्त्र, राजनीति और कूटनीति के आचार्य थे।

    चाणक्य की श्रेष्ठ नीति – Chanakya Ke Suvichar – Acharya Chanakya Quotes in Hindi




    एक महान विद्वान, अर्थशास्त्री और राजनीति (Great Economist & Politician)

    चाणक्य का नाम राजनीति, राष्ट्रभक्ति एवं जन कार्यों के लिए सदैव अमर रहेगा। 2300 वर्ष बीत जाने पर भी उनकी गौरवगाथा धूमिल नहीं हुई है। चाणक्य की कूटनीति को आधार बनाकर संस्कृत में एक अत्यंत प्रसिद्ध ‘मुद्रराक्षस’ नामक नाटक भी लिखा गया है।

    दो घटनाओं ने एक महान शिक्षक की जीवन की दिशा बदली

    एक शिक्षक के रूप में उनकी ख्याति आसमान की ऊंचाइयों को छू रही थी। उस दौरान घटित दो घटनाओं ने उनके जीवन की दिशा ही मोड़ दी।

    पहली घटना

    भारत पर सिकंदर का आक्रमण और तात्कालिक छोटे राज्यों की पराजय।

    इस पूरी घटना के बाद आचार्य चाणक्य (Chanakya) ने हिंदूस्तान या कहें भारतवर्ष को बाहरी आकं्राताओं से बचाने के लिए एक राष्ट्र की परिकल्पना की। इसी कल्पना को साकार रूप देने के लिए चाणक्य जीवन पर्यंत संघर्षरत और प्रयासरत रहे।

    दूसरी घटना

    मगध के शासक का कौटिल्य का भरी राजसभा में अपमान।

    इन दो वजहों से विष्णुगुप्त देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए छात्र-छात्राओं को पढ़ाने के बजाय देश के राजाओं को शिक्षित करने का संकल्प ले निकल पड़े। चाणक्य के जीवन की दिशा बदलने वाले प्रसंग पर गौर करना आवश्यक है। भारत पर सिकंदर के आक्रमण के समय चाणक्य तक्षशिला में प्राध्यापक थे। तक्षशिला और गांधार के राजा आंभि ने सिकंदर से समझौता कर लिया। चाणक्य ने भारत की संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया लेकिन सिकंदर से लडऩे कोई नहीं आया। पुरु ने सिकंदर से युद्ध किया लेकिन हार गया। उस समय मगध अच्छा खासा शक्तिशाली राज्य था और उसके पड़ोसी राज्यों की आंखों का कांटा भी।

    देशहित को सर्वोपरी मानने वाले विष्णुगुप्त (Vishnugupta) मगध के तत्कालीन सम्राट धनानन्द से सिकंदर के प्रभाव को रोकने के लिए सहायता मांगने गए लेकिन भोग-विलास एवं शक्ति के घमंड में चूर धनानंद ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। उसने कहा कि पंडित हो और अपनी चोटी का ही ध्यान रखो। युद्ध करना राजा का काम है तुम पंडित हो सिर्फ पंडिताई करो। तभी चाणक्य ने अपनी चोटी खोल दी और प्रतिज्ञा ली कि जब तक मैं नंद साम्राज्य का नाश नहीं कर दूंगा, चोटी नहीं बांधूंगा।



    चंद्रगुप्त को शिष्य बनाना – Chandragupta Maurya

    चाणक्य के जीवन का प्रसंग चंद्रगुप्त की बिना अधूरा है। उनकी प्रतिज्ञा को सार्थक करने में चंद्रगुप्त माध्यम बने। एक प्रवास के दौरान चाणक्य की नजर एक ग्रामीण बालक पर पड़ी। उनकी दिव्यदृष्टि ने बालक में राजत्व की प्रतिभा को भांप लिया। चाणक्य ने 1,000 कार्षापण (मुद्रा) देकर उस बालक को उसके पालक-पिता से खरीद लिया। उस समय चंद्रगुप्त आठ-नौ वर्ष के बालक थे। चाणक्य ने उसे अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की भी सर्वांगीण शिक्षा दिलाई। माना जाता है कि उस वक्त कुछ ही प्रमुख शासक जातियां थी जिसमें शाक्य, मौर्य का प्रभाव ज्यादा था। चंद्रगुप्त उसी गण प्रमुख का पुत्र था। चाणक्य ने उसे अपना शिष्य बना लिया एवं एक सबल राष्ट्र की नींव डाली जो आज तक एक आदर्श है। पालि स्रोतों से प्राप्त चंद्रगुप्त के प्रारंभिक जीवन का विवरण मिलता है।

    चाणक्य नीति- इन तीन चीजों से रखें उचित दूरी (Chanakya Neeti in Hindi)

    राजतंत्र के समर्थक कौटिल्य (Kautilya) का कहना था कि प्रजा के सुख में राजा का सुख होना चाहिए। प्रजा के हित में ही राजा का हित निहित होना चाहिए। इसके लिए उसे बाल्यकाल से ही शिक्षित किया जाना चाहिए। एक अच्छे शासक बनने की प्रक्रिया मुंडन संस्कार से शुरू हो जानी चाहिए। सर्व प्रथम वर्णमाला तथा अंकमाल का अभ्यास कराना चाहिए। उपनयन के बाद नई आंविक्षिकी वार्ता और दंडनीति का ज्ञान कराया जाना चाहिए। कौटिल्य ने अपनी इसी निती से चंद्र गुप्त मौर्य को बाल्यकाल से ही एक श्रेष्ठ शासक के रूप में शिक्षित किया। चाणक्य की शिक्षा से परांगत होकर चंद्रगुप्त ने सिकंदर को पराजित ही नहीं किया बल्कि अपने कार्यकौशल तथा बौद्धिक कौशल से एक श्रेष्ठ शासक के रूप में इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।

    अर्थशाश्त्र की रचना एवं राज्य की अवधारणा

    इसमें सभी राजनीतिक विचारों को समाहित किया गया है। कौटिल्य (Kautilya) ने राज्य की अवधारणा को प्रतिपादित किया लेकिन यह कहना कठिन है कि उस समय राज्य का विचार क्यों प्रतिपादित हुआ। शायद कौटिल्य के अध्यापन कार्य को छोड़ कर इस व्यवस्था में आने का कारण ही राज्य की उत्पत्ति का कारण रहा होगा। उस समय विद्यमान हिंसा और अव्यवस्था ने राज्य की अवधारणा को जन्म दिया होगा।

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